कल तक जो लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए लड़ती थी, आज खुद हो रहा उसके साथ अन्याय

PATNA : यह लड़की महज दो साल पहले तक ट्रैफिकिंग की शिकार युवतियों की लड़ाई लड़ती थी, मगर आज जब बात अपने पर आयी तो अकेली रह गयी, एक छोटे से बच्चे के साथ पिछले आठ महीने से खुद यहां-वहां न्याय के लिए भटक रही है. उसके साथियों ने हाथ खड़े कर दिये हैं. कभी समाज को बदलना चाहती थी, आज अपने ही नसीब से अकेले जूझ रही है… आइये जानते हैं, उसकी कहानी, उसी की जुबानी…

पटना में एक स्वयंसेवी संस्था के होस्टल में वार्डन के लिए एक छोटा सा अँधेरा कमरा है. वहां वह अपनी सात महीने के बेटी को सीने से लगाये टहल रही है और अपनी कहानी सुना रही है. बीच-बीच में उसकी बच्ची सिसकने लगती है तो वह उसे चुप कराने में व्यस्त हो जाती है. और उसे चुप करा कर वह फिर अपनी दास्तान कहने लगती है. वह कहती है, पिछले डेढ़ साल में उसकी दुनिया इतनी बदल गयी है कि मैं खुद को ही पहचान नहीं पाती हूँ. सोचा था कि मजहब की दीवारें तोड़ कर समाज में मिसाल कायम करूंगी. मगर आज न अपना ठिकाना है, न इस बच्चे का. घरवालों ने पहले ही मरी हुई मान लिया था. ससुराल वाले जब मुझे मुसलमान न बना पाए तो घर से खदेड़ दिया. पति को रिश्ता तोड़ना था तो मुझे बदचलन कह कर अपने इलाके में बदनाम कर दिया. थाने में शिकायत करने पहुंची तो थानाध्यक्ष ने सादे कागज पर विवाह विच्छेद करा दिया, बिना किसी मुआवजे और हर्जाने के. लव जिहाद की बातें तो अक्सर सुनती रही हूँ, मगर एक भाजपा नेता मेरे साथ लव जिहाद का खेल खेलेगा कभी सोचा न था.

वह कहती है, यह कहानी फेसबुक से शुरू हुई. मेरे पास …….. नाम के इस सज्जन का फ्रेंड रिक्वेस्ट आया. ये कह रहे थे, इनकी बहन की उसके ससुराल वालों ने मुम्बई में हत्या कर दी थी और लाश बोरी में डाल कर गटर में फेक दिया था. इन्होंने मुझसे मदद मांगी थी. तब मैं मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई कर एक संस्था के साथ ह्यूमैन ट्रैफिकिंग के खिलाफ काम करती थी और कुछ पत्र पत्रिकाओं में फ्रीलांस लिखती थी. और इनकी वाल पर मोदी की तारीफ भरी रहती थी. ये खुद को अपने शहर का बड़ा कारोबारी और भाजयुमो के प्रदेश स्तर का नेता बताते थे. अपने फेसबुक वाल पर भी उन्होंने ये जानकारियां लिख रखी हैं. खैर, उस वक़्त मैंने इनकी काफी मदद की और इस दरम्यान हमारी दोस्ती भी हो गयी.

फिर वे कहने लगे कि इनकी दो छोटी बहनें पटना में अकेली रह कर पढ़ती हैं, मैं लोकल अभिभावक बन कर दोनों का ख्याल रखूं. यह भी मुझे बुरा नहीं लगा. फिर एक दिन इन्होंने कह दिया कि मेरे घर में आप जैसी महिला की जरूरत है, जो पढ़ी-लिखी समझदार और अपने अधिकारों के प्रति सजग हो. उस वक़्त तक मुझे इनका व्यवहार अच्छा लगने लगा था. ये अक्सर कहते कि मैं जात धर्म नहीं मानता. मेरे साथ मंदिर जाते और कहते कि अगर आप कहेंगी तो मैं हिन्दू बन जाऊंगा.
उस वक़्त मैं खुद आदर्शों की दुनिया में खोई रहती थी. मेरे सामने में कई विवाहित जोड़े मिसाल की तरह थे, जो अलग-अलग धर्म को मानने वाले थे. अपनी-अपनी आस्थाओं को मानते हुए वे न सिर्फ सुखमय जीवन जी रहे थे बल्कि समाज को भी बदलने में मदद कर रहे थे. मुझे लगता था कि मैं भी मिसाल कायम कर सकती हूँ. हमने दिसम्बर, 2014 में एक मंदिर में शादी की और कोर्ट से शादी का प्रमाणपत्र भी हासिल कर लिया.

मगर शादी होते ही सब कुछ बदल गया. मेरे मां बाप ने मुझे मरा हुआ घोषित कर दिया और इनके माँ बाप मुझे मुसलमान बनाने पर जोर डालने लगे. शादी के बाद जब हम लोग हनीमून मनाने मुंबई गये थे, तब इन्होंने मुझसे कहा कि मां-बाप को हमें खुश रखना चाहिए. तुम बस कलमा पढ़ना सीख लो, मेरे घर के सारे लोग खुश हो जायेंगे. तो वहां इन्होंने इस बहाने मुझे कलमा पढ़ाया. तब से मुझे मुसलमान बनाने की ट्रेनिंग शुरू हो गयी. ये मुझे नमाज पढ़ना सिखाते और इनकी बहनें फोन पर मुझे मुस्लिम समाज की रवायतें सिखातीं. मैं इन सब चीजों के लिए तैयार नहीं थी, मगर रिश्ते को बचाने के लिए सब कुछ करती जाती थी. इस बीच मैं प्रेग्नेंट भी हो गयी.

अब तक मैं इनके घर नहीं गयी थी. पटना में रह कर ही जॉब करती थी. ये हर हफ्ते मुझसे मिलने अपने शहर से आते थे. जब मेरे गर्भ में बच्चा सात महीने का हो गया तो मैंने कहा कि अब मैं जॉब नहीं कर सकती. मुझे अपने घर लेकर चलें. ये मेरे दबाव पर मुझे अपने घर तो ले गये मगर वहां इनके घर में मुझे जगह नहीं मिली. मुझे इन्होने किराये के मकान में रखा. वहीँ पिछले साल अगस्त में इस बच्ची का जन्म हुआ. फिर कुछ दिन बाद इनके माँ-बाप मान गये. मुझे घर में जगह दी. और एक बार फिर मेरा प्रशिक्षण शुरू हुआ. मुझे बुरका पहनाया गया. पांच वक़्त नमाज पढ़ने की पाबंदी कर दी गयी. वुजू करना सिखाया गया और साथ में उर्दू लिखना पढ़ना भी. चुकी मेरी बच्ची छोटी थी लिहाजा मैं इन सब कामों के लिए वक़्त नहीं दे पाती थी. सो एक दिन इन लोगों ने घोषित कर दिया कि मैं सीखना नहीं चाहती. बदमाश हूँ.

फिर इन लोगों ने नई योजना पर काम करना शुरू कर दिया. कहने लगे, अब मुझे पटना जाकर फिर से नौकरी करना शुरू कर देना चाहिए. मैं भी तैयार थी. मगर ये मुझे अपनी बच्ची को साथ ले जाने नहीं देना चाहते थे. पति ने बहला फुसला कर मुझे यहाँ पहुंचा दिया, बच्ची वहीं उनके पास रह गयी. मेरे यहाँ आते ही पति का व्यवहार पूरी तरह बदल गया. अब वे मुझे फोन नहीं करते, मैं करती तो उठाते नहीं. मुझे शक होने लगा और अपनी बच्ची को लेकर फ़िक्र भी होने लगी. यहाँ नई नौकरी थी, काम कुछ ज्यादा था. फिर भी पहली फुर्सत में ससुराल भागी. वहां गयी तो पता चला कि इन लोगों ने मेरे लिए घर के दरवाजे बंद कर लिए थे. पति ने मुहल्ले में अफवाह फैला रखी थी कि मैं अपनी बच्ची को छोड़ कर किसी के साथ भाग गयी हूँ. मैं बदचलन हूँ. वगैरह वगैरह.

मैंने घर घुस कर अपनी बच्ची को लेना चाहा तो इन लोगों ने मुझ पर पत्थरों से हमला कर दिया. मैं किसी तरह वहां से जान बचा कर भागी. मोहल्ले की वार्ड काउंसलर ने मुझे शरण दी और मुझे लेकर थाने गयी. थाने में पुलिस वाले उलटे मुझे ही दोष लगाने लगे. वहां भी वार्ड काउंसलर मेरे पक्ष में डटी रहीं. महिला हेल्पलाइन के लोगों ने भी मेरी मदद की. मुझे बच्चा दिलाया गया. मगर थानेदार ने इसके एवज में एक सादे कागज पर मुझसे दस्तख्वत करवा लिए कि मेरा ……… से विवाह विच्छेद हो गया है. मेरा और मेरे बच्चे का इन पर कोई दावा नहीं है.

यह सब इस साल(2016) फरवरी महीने की 12 तारीख को हुआ है. तब से इस बच्चे के साथ मैं इस संस्था में हूँ. अब समझ नहीं आता कि क्या करूं, कैसे करूं. छोटी बच्ची को लेकर कहीं आना जाना भी मुश्किल है. फिर मेरे ससुराल वाले अभी भी मुझे चैन से जीने नहीं देते. पिछले दिनों अचानक मेरा देवर चुपके से यहाँ आ गया और मेरी गैरहाजिरी में मेरा मोबाइल लेकर भाग गया. मुझे भय है कि वह बच्चे को मुझसे छीनना चाहता था. अभी भी मेरे और मेरे बच्चे के सारे गहने उनके पास हैं. ठीक से शादी भी खत्म नहीं हुई.

थाने में सादे कागज पर कहीं तलाक़ होता है. मैं चाहती हूँ, उस व्यक्ति को सजा मिले जिसने मेरे साथ और इस बच्चे के साथ धोखा किया. मगर मैं अभी कुछ भी कर पाने में खुद को असहाय पाती हूँ. विश्वास नहीं होता कि यह मैं ही थी जो कभी ट्रैफिकिंग की शिकार लडकियों की लड़ाई लड़ा करती थी. (इस कहानी के भुक्तभोगी और आरोपी दोनों मेरे फ्रेंडलिस्ट में हैं. मगर आरोपी से न कोई खास परिचय है, न बातचीत नहीं हुई है. इसलिए मैंने न भुक्तभोगी का नाम जाहिर किया है, न दोषी का परिचय. अगर आप सचमुच पूरी गंभीरता से इस युवती की मदद करना चाहते हैं, तो मेरे पास इनका फोन नंबर है.)

लेखक : पुष्य मित्र, वरिष्ठ पत्रकार, पटना(यह आलेख मूल रूप से फेसबुक पर प्रकाशित की गई है)

Bicky

मैं बिकेश्वर त्रिपाठी जन्म कोलकाता जीवन से मिले अनुभवों और ठोकरों से विकसित हुए नजरिए की कसौटी पर कसकर, वर्तमान मुद्दों पर आपसे अपनी बात लाइव बिहार के माध्यम से साझा करता रहूंगा |