वक्त के साथ बदला राजनीति, जनता से मदद लेकर सामूहिक चंदे से चुनाव लड़ते थे नेताजी

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PATNA : एक समय था जनता की मदद से ही लोग चुनाव लड़ते थे। महंगाई थी, लेकिन चुनाव पर इसका गहरा असर नहीं था। गरीब तबके के लोग भी सामूहिक चंदे से चुनाव लड़ते थे और चुनाव जीत जाते थे। यह कहना है बलिया (अब बेगूसराय) सीट से 1996 में चुनाव जीतने वाले पूर्व सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह का। उनका कहना था कि उस समय साम्प्रदायिकता और जातीयता इतनी अधिक हावी नहीं थी। धन कुबरों का वर्चस्व भी नहीं था। लिहाजा, छोटी पार्टियों से और निर्दलीय खड़े होकर भी लोग चुनाव जीत जाते थे। बलिया-बेगूसराय क्षेत्र में शुरू से वामपंथ का गहरा प्रभाव रहा है। इसलिए यहां के लोग संघर्षशील, जुझारू व्यक्ति को जन प्रतिनिधि बनाना पसंद करते थे। भाकपा और अन्य वामपंथी पार्टियां भी जमीन से जुड़े उम्मीदवारों को ही टिकट देती थीं। बाहरी लोगों या हवाई नेताओं की कोई पूछ नहीं होती थी।

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वाम दर्शन से ही बदलेगी तस्वीर: उनका कहना है कि 90 के दशक में सांप्रदायिकता को सफलता पूर्वक वामपंथी दलों ने रोका था। इस बार भी बिना वाम दलों के सहयोग के फासिस्ट ताकतों को परास्त नहीं किया जा सकता है। वर्तमान समय में राजद व कांग्रेस के पास धर्मनिरपेक्ष ताकतों की गोलबंदी का जिम्मा है।

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पूर्व सांसद ने कहा कि वे वर्ष 1984 से 95 तक विधान पार्षद रहे। इसके बाद पहली बार लोकसभा चुनाव लड़े थे। अब पैसे का इतना दखल हो गया है कि वामदलों और गरीबों को चुनाव लड़ने में काफी दिक्कत होती है। लेकिन जनता का सहयोग पूर्ववत मिलता है। पुराने दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि तब उनकी जेब से भी एक पैसा खर्च नहीं हुआ था। पूरा खर्च पार्टी फंड से और कैडर के लोगों ने जनता से दो रुपए-पांच रुपए लेकर किया था। लोग घर से भोजन कर अपने संसाधन से उम्मीदवार का प्रचार करते थे। 1996 में उन्होंने भाजपा के राम लखन सिंह को हराया था। करीब ढाई लाख वोट से उनकी जीत हुई थी। सभी धर्मनिरपेक्ष दलों की गोलबंदी के कारण वे भाजपा को हराने में सफल हुए थे।