बिहार की राजनीति में चौराहे पर उपेंद्र कुशवाहा, भाजपा के साथ नहीं बनी बात, कल देंगे इस्तीफा !

upendra

PATNA : राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के सुप्रीमो हैं उपेंद्र कुशवाहा। कोईरी के देवता नहीं हैं। ‘कोईरी का देवता’ मुहाबरा है। माना जाता है कि कोईरी के देवता काफी सीधा-साधा होते हैं। करीब पिछले दो दशक से संसदीय राजनीति में महत्वपूर्ण जिम्मेवारियों का निर्वाह कर रहे उपेंद्र कुशवाहा नीतीश के खिलाफ लडा़ई लड़ते रहे हैं। हालांकि उनकी राजनीति की शुरुआत भी नीतीश कुमार की छत्रछाया में शुरू हुई थी।

उपेंद्र कुशवाहा पहली बार 2000 में जन्हादा से विधान सभा के लिए निर्वाचित हुए थे। वे समता पार्टी के विधायक थे। 2003 में समता पार्टी का जदयू में विलय हो गया। विलय के बाद विधान सभा में विधायकों का संख्या गणित बदल गया। विधान सभा में भाजपा से ज्यादा जदयू के विधायक हो गये। इस कारण जदयू ने विधान सभा में विपक्ष के नेता पर दावा ठोक दिया। इसके बाद सुशील कुमार मोदी को नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ना पड़ा और उनकी जगह पर उपेंद्र कुशवाहा नेता प्रतिपक्ष बने गये। लेकिन अगला चुनाव 2005 में उपेंद्र कुशवाहा हार गये। इसके बाद उन्होंने नीतीश विरोध की राजनीति शुरू की। परिणाम यह हुआ कि नीतीश के मुख्यमंत्रित्व काल में उपेंद्र कुशवाहा का बोरिया-बिस्तर सरकारी बंगले से बाहर फेंक दिया गया। बाद में उपेंद्र की बढ़ती ताकत को देखते हुए नीतीश ने उन्हें गले लगाया और जदयू के टिकट पर राज्यसभा भेज दिया।

लेकिन यह दोस्ती ज्यादा लंबी नहीं चली। उपेंद्र ने नीतीश कुमार पर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का आरोप लगाया। उनके इसी आरोप को पार्टी विरोधी गतिविधि मानकर जदयू ने राज्यसभा सचिवालय से उनकी सदस्यता समाप्त करने की अर्जी दी। अपनी सदस्यता गंवाने से पूर्व उपेंद्र कुशवाहा ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद नीतीश विरोधी मोर्चा संभाल लिया। कुशवाहा जाति को गोलबंदी करने की कोशिश की और जाति के ‘ब्रांड’ बन गये। 2014 में लोकसभा चुनाव के पूर्व रालोसपा के नाम से नयी पार्टी बनायी और एनडीए में शामिल हो गये। तीन सीटें मिली और तीनों जीत लिये। तीन में दो सांसद कुशवाहा। केंद्र में मंत्री भी बने।

अब फिर चौराहे पर हैं। एनडीए से मोहभंग हो गया है। नयी संभावना पर अभी चुप हैं। अमित शाह के साथ बात नहीं बनी तो केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे सकते हैं। यानी एक बार फिर लड़ाई की नयी शुरुआत। लड़ाई की मुख्य वजह फिर नीतीश कुमार ही हैं। नीतीश के एनडीए में शामिल होने से खुश नहीं हैं। अब खुला विरोध जताने लगे हैं। नयी लडा़ई में नये साथी की तलाश भी करेंगे। लेकिन चुनाव में अभी कम से कम 6 माह बाकी हैं। इसलिए लड़ाई जारी रहेगी। उनसे गले मिलने वाले को भी समझ लेना चाहिए कि ‘कोईरी के देवता’ नहीं हैं उपेंद्र कुशवाहा। नीतीश कुमार ने फिर पलटी मारी तो उपेंद्र को भी पाला बदलने में देर नहीं लगेगी।

साभार : BYN

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